बेहद अनूठी है ये सीट, ब्राह्मण प्रत्याशी 14 में से 13 बार जीते!….ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण की राजनीति में हारी कांग्रेस, ब्राह्मण कर सकते हैं इस भाजपा सीट का तख्ता पलट


कहते हैं बेलतरा विधानसभा में कांग्रेस की हार की आधी स्क्रिप्ट तो उसी दिन लिख दी गई थी, जिस दिन पार्टी प्रत्याशी की घोषणा करती है | बेलतरा की सियासत को करीब से जानने वाले इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि यहां की सियासत ब्राह्मण बनाम ब्राम्हण की चलती आ रही है, ये लड़ाई आज की नहीं है, दशकों पहले ये लड़ाई शुरू हुई थी, आबादी के आंकड़ों में 20 फीसदी के आसपास दर्ज ब्राह्मण वर्ग को बेलतरा विधानसभा के मतदाताओं ने विधायक के रूप में सबसे ज्यादा संवारा । अब तक एक अपवाद को छोड़ दिया जाए तो हुए विधानसभा चुनाव में 13 बार ब्राह्मण विधायक चुने जा चुके हैं |
वर्ष 1952 में पहली लोकसभा चुनाव में ब्राह्मण विधायक चुने जाने की शुरूआत हुई । तब कांग्रेस प्रत्याशी रामेश्वर शर्मा यहां से विधायक बने थे । इसके बाद श्री शर्मा लगातार तीन पंचवर्षीय तक जीत का परचम लहराए रखे, अगले तीन चुनावों में 1957, 1962 और 1967 में क्रमश: रामेश्वर शर्मा ही विधायक चुने गए । 1971 में फिर कांग्रेस के ब्राह्मण विधायक ने सीट पर कब्जा जमाया, सिर्फ प्रत्याशी बदल गया, कांग्रेस के प्रत्याशी राधेश्याम शुक्ल विजयी हुए । इसके बाद लगातार दो चुनावों में ब्राह्मण प्रत्याशियों की जीत का सिलसिला जारी रहा । 1985 में कांग्रेस ने अरुण तिवारी को प्रत्याशी बनाया, उन्होंने ने भी कांग्रेस की जीत की परंपरा को जारी रखा | आजादी के बाद 1990 में भाजपा के बद्रीधर दीवान ने यह सीट हथियाली, लेकिन सीट की तासीर नहीं बदली, ब्राम्हण ने ही सीट पर कब्ज़ा जमाया |
इसके बाद कांग्रेस के चंद्र प्रकाश बाजपेयी 1993 की चुनाव में जीत हासिल किया, लेकिन इसके बाद विगत चार चुनावों में कांग्रेस की खाता नहीं खुल पाई है, वजह गैर-ब्राम्हण प्रत्याशी बनाना | कांग्रेस ने 1998 में चन्द्र प्रकाश बाजपेयी को प्रत्याशी बनाया था, लेकिन जनता ने एक सिरे से नाकार दिया | इसके बाद लगातार कांग्रेस तीन चुनावों से गैर-ब्राम्हण चेहरा का प्रयोग कर रही है, लेकिन इन चेहरों को जीत नहीं मिल पाई है |
कांग्रेस इस बार इस सीट से अपनी जीत की परंपरा को फिर से शुरू कर सकती है, इस बार एकबार फिर बेलतरा से ब्राम्हण दावेदारों की संख्या देखने को मिल रही है, तक़रीबन 18 की संख्या में ब्राम्हण दावेदार ब्राम्हण को ही टिकट देने की मांग को लेकर अड़े हुए हैं, किसी एक ब्राम्हण को टिकट देने पर सभी ब्राम्हण एकसाथ काम करने का वायदा भी पार्टी को करते दिखाई दे रहे हैं | कांग्रेस को इस परंपरागत सीट को वापस पाना है तो इस बार ब्राम्हण कार्ड खेलना होगा | इस सीट पर ब्राम्हण ही जीत का झंडा लहरा सकता है |
इस बात का सबूत भाजपा भी देते नजर आ रही है, भाजपा के बद्रीधर दीवान चार बार के विधायक हैं, स्वास्थ्य को देखते हुए पार्टी और संघ नए चहरे की तलाश शुरू कर दी है, मजेदार बात यह है कि पार्टी ब्राम्हण चेहरे पर ही भरोसा दिखा रही है, यही वजह है कि भाजपा नए प्रत्याशी की तलाश तो कर रही है लेकिन चेहरा ब्राम्हण ही ढूंढ रही है, जो इस सीट पर दीवान की जगह जीत का झंडा लहरा सके |
ऐसे में कांग्रेस को भी इस सीट पर जीत का झंडा लहराने के लिए ब्राम्हण प्रत्याशी पर फोकस करना होगा | 18 दावेदारों में से एक चेहरा पर ही मुहर लगाकर कांग्रेस सीट पर वापस कब्ज़ा पा सकती है |

cgnews24 Team

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