नकटी: बुलडोजर मकानों पर चला है या भरोसे पर?…पढ़िए संपादक- हर्ष पांडेय का नजरिया
हर्ष पांडेय, संपादक, दैनिक भास्कर, रायपुर।
नकटी गांव का विवाद अब सिर्फ अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं रह गया है। यह सरकार, प्रशासन और जनता के बीच भरोसे की परीक्षा बन गया है। सवाल यह नहीं है कि सरकारी जमीन पर कब्जा था या नहीं। यदि था, तो सरकार को उसे खाली कराने का पूरा अधिकार है। सवाल यह है कि क्या किसी लोकतांत्रिक सरकार की ताकत सिर्फ बुलडोजर चलाने में दिखनी चाहिए, या लोगों का विश्वास जीतने में भी?
30 जून की सुबह चार बजे जब प्रशासन भारी पुलिस बल और बुलडोजरों के साथ गांव पहुंचा, तब उसने कानून का पालन जरूर किया होगा, लेकिन संवेदनशील शासन का परिचय नहीं दिया। महिलाएं बुलडोजर के सामने बैठीं, बच्चे रोते रहे, लोग अपना सामान बचाने की कोशिश करते रहे और देखते ही देखते वर्षों का आशियाना मलबे में बदल गया। कानून का दृश्य दिखाई दिया, लेकिन करुणा का नहीं।
सरकार का कहना है कि 15.479 हेक्टेयर सरकारी जमीन पर वर्षों से अतिक्रमण था। यह भी सही हो सकता है। लेकिन फिर दूसरा सवाल भी उतना ही बड़ा है। यदि यह जमीन वर्षों से अतिक्रमण में थी, तो इतने वर्षों तक प्रशासन करता क्या रहा? क्या सरकारी मशीनरी सो रही थी? अगर लोगों ने वहां बिजली कनेक्शन लिए, राशन कार्ड बने, वोट डाले, सरकारी योजनाओं का लाभ मिला, कहीं प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बने, तो यह सब किसकी जानकारी में हुआ? सरकार नागरिक को पहले वैधता का भरोसा दे और फिर एक दिन अचानक उसे अवैध घोषित कर दे, यह व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।

विधायक आवास बनना चाहिए। राजधानी बढ़ रही है तो जनप्रतिनिधियों के लिए बेहतर अधोसंरचना भी जरूरी है। लेकिन क्या उसका रास्ता ऐसा होना चाहिए कि गरीब का घर टूटे और सरकार की छवि भी? विकास और विस्थापन का रिश्ता नया नहीं है, लेकिन आधुनिक शासन की पहचान यही है कि विकास के साथ सम्मानजनक पुनर्वास भी हो।
सरकार यह कह रही है कि प्रभावित परिवारों को नया रायपुर के ईडब्ल्यूएस आवासों में बसाया जाएगा। यदि ऐसा है तो पहले वहां सभी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित क्यों नहीं की गईं? लोग जब वहां पहुंचे तो पानी, रोज़गार, स्कूल, परिवहन और रोजमर्रा की जरूरतों को लेकर सवाल क्यों उठे? पुनर्वास का मतलब केवल चार दीवारें देना नहीं होता। पुनर्वास का मतलब है जीवन को फिर से व्यवस्थित करना।
इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीति को भी अवसर दे दिया है। कांग्रेस सरकार को घेर रही है, भाजपा कार्रवाई को कानूनी बता रही है। लेकिन जिनके घर टूटे हैं, उनके लिए यह सत्ता और विपक्ष की बहस नहीं, बल्कि जीवन का संकट है। उनके लिए सबसे बड़ा सवाल है कि अब ये परिवार कहां रहेंगे।
प्रशासन को यह भी समझना होगा कि बुलडोजर तात्कालिक समाधान दे सकता है, स्थायी स्वीकार्यता नहीं। प्रशासनिक शक्ति का सबसे प्रभावी उपयोग वह होता है, जहां कानून और मानवीय संवेदना साथ-साथ चलें। यदि दोनों में संतुलन बिगड़ता है तो सही निर्णय भी गलत संदेश देने लगता है।
नकटी का मामला केवल एक गांव का नहीं है। यह पूरे छत्तीसगढ़ के लिए चेतावनी है। आज वहां विधायक आवास के लिए जमीन चाहिए, कल किसी और परियोजना के लिए होगी। इसलिए राज्य को एक स्पष्ट, पारदर्शी और मानवीय पुनर्वास नीति पर अमल करना होगा, ताकि विकास की कीमत किसी गरीब का सम्मान न बने। ‘माननीयों’ को चाहिए कि नकटी में उनके आवास बनने के पहले इस गांव की तरह उनके निर्वाचन क्षेत्र के हर शहर में अवैध कब्जे हटाने का संकल्प ले लें। सरकार को चाहिए कि पुनर्वास, मुआवजा और सुविधाओं की स्थिति सार्वजनिक करे, प्रभावित परिवारों से खुले संवाद करे और जहां भी प्रशासनिक चूक हुई है, उसे स्वीकारने का साहस भी दिखाए। कानून की जीत तभी मानी जाएगी, जब उसके साथ न्याय का एहसास भी जुड़ा हो। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे मजबूत सरकार वह नहीं होती जिसके पास सबसे बड़ा बुलडोजर हो, बल्कि वह होती है जिसके निर्णयों पर सबसे अधिक भरोसा हो।
खैर… “माननीयों” को उनका नया आवास मुबारक..!

