छत्तीसगढ़ में 250 MBBS सीटों पर लगा ब्रेक! 5 नए मेडिकल कॉलेजों को नहीं मिली NMC मान्यता, जानिए क्या है वजह

रायपुर, 12 जून 2026. छत्तीसगढ़ में चिकित्सा शिक्षा के विस्तार को बड़ा झटका लगा है। नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने दंतेवाड़ा, मनेंद्रगढ़, कुनकुरी (जशपुर), जांजगीर-चांपा और कवर्धा में प्रस्तावित पांच नए मेडिकल कॉलेजों को मान्यता देने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही राज्य में 250 नई एमबीबीएस सीटें जोड़ने की योजना फिलहाल अटक गई है।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ के 10 मेडिकल कॉलेजों में कुल 1,430 एमबीबीएस सीटें संचालित हैं। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने नए कॉलेजों के संचालन की लगभग सभी तैयारियां पूरी कर ली थीं, यहां तक कि डीन की नियुक्ति और भर्ती प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई थी।
भवन और अस्पताल की कमी बनी सबसे बड़ी बाधा
NMC के नियमों के अनुसार मेडिकल कॉलेज के साथ पर्याप्त अस्पताल सुविधा और पूर्ण विकसित भवन अनिवार्य होते हैं। जांच में सामने आया कि कई प्रस्तावित कॉलेजों के भवन अब तक पूरे नहीं हो पाए हैं, जबकि कुछ स्थानों पर जिला अस्पताल की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है।
जानकारी के अनुसार कुछ जगहों पर कम्युनिटी हेल्थ सेंटर (CHC) को बड़े अस्पताल के रूप में दिखाकर अनुमति लेने की कोशिश भी की गई थी, जिस पर आपत्ति जताई गई।
यह है नियम
नेशनल मेडिकल कमीशन के नियमानुसार, अस्पताल ना होने की स्थिति में भवन को अपग्रेड करके व्यवस्था की जा सकती है, लेकिन महाविद्यालय का भवन होना अनिवार्य है। जिन पांच स्थानों पर मेडिकल कॉलेज खोलने प्रस्ताव भेजा गया है, उनमें से कहीं भी भवन नहीं है। इन पांच स्थानों में से दो में जिला अस्पताल भी नहीं है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को अस्पताल के तौर पर दिखा अनुमति मांगी जा रही थी। एनएमसी ने इसके लिए परमिशन देने से मना कर दिया।
भर्ती प्रक्रिया में भी नहीं मिला अपेक्षित रिस्पॉन्स
नए मेडिकल कॉलेजों के लिए 175 डॉक्टरों की संविदा भर्ती हेतु वॉक-इन-इंटरव्यू आयोजित किया गया था, लेकिन केवल 9 डॉक्टर ही पहुंचे, जिनमें से 8 का चयन हुआ। वहीं 149 शैक्षणिक पदों के लिए आवेदन प्रक्रिया जारी है।
न प्रमोशन और न ही प्रोबेशन पीरियड खत्म किया
प्रदेश के 10 मेडिकल कॉलेजों में सेवाएं दे रहे फैकल्टी का न प्रोबेशन पीरियड खत्म हो रहा है और न ही पात्र डॉक्टरों का प्रमोशन किया गया है। शासन ने नेहरू समेत विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में 73 असिस्टेंट प्रोफेसरों का प्रोबेशन पीरियड खत्म नहीं किया है।
वहीं 296 डॉक्टर प्रमोशन के लिए पात्र हैं, जो डीन व अधीक्षक बनने के लिए पात्र है। असिस्टेंट से एसोसिएट व एसोसिएट से प्रोफेसर बनने के लिए इलिजिबल है। 10 में 4 मेडिकल कॉलेज प्रभारी डीन के भरोसे चल रहे हैं। डॉक्टरों का प्रमोशन होता तो नए कॉलेजों को प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर मिल जाते। इससे मान्यता में आसानी भी होती।
सरकारी को मिल जाती है मान्यता, ओवर कांफिडेंस पड़ा भारी
चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों का ओवर कांफिडेंस भारी पड़ गया, जिसमें ये माना जाता है कि सरकारी मेडिकल कॉलेज होने के कारण मान्यता मिल ही जाती है। पहले कांकेर, महासमुंद, दुर्ग व कोरबा कॉलेजों की मान्यता को लेकर ऐसा हो चुका है। ऐसे में अधिकारियों की बेपरवाही भारी पड़ गई। दरअसल एनएमसी ने 2023 में जरूरी पैरामीटर बना दिया है। इस पैरामीटर पर खरा उतरने पर ही कॉलेजों को मान्यता दी जा रही है।
एफिलिएशन सर्टिफिकेट तक अटैच नहीं किया, ये बेपरवाही
जिन 5 कॉलेजों का आवेदन रिजेक्ट किया गया है, उनमें कुछ कॉलेजों ने हैल्थ साइंस विवि का एफिलिएशन सर्टिफिकेट भी एनएमसी को नहीं भेजा है। पत्रिका की पड़ताल में पता चला है कि ऐसे कॉलेजों की संख्या दो से तीन है। कॉलेज के संबंधित अधिकारियों की लापरवाही देखिए। इस सर्टिफिकेट के बिना कॉलेज शुरू ही नहीं हो सकता। विवि भी सरकारी मेडिकल कॉलेज को आसानी से एफिलिएशन दे देता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने से कॉलेजों को मान्यता मिल जाएगी।
करोड़ों की लागत से बन रहे थे भवन
सरकारी आंकड़ों के अनुसार—
- मनेंद्रगढ़: ₹323.03 करोड़
- कवर्धा व जांजगीर-चांपा: ₹318.27 करोड़
- दंतेवाड़ा: ₹326.53 करोड़
- कुनकुरी: ₹359 करोड़
इन सभी कॉलेजों के भवन निर्माण के लिए राशि स्वीकृत हो चुकी है, लेकिन निर्माण और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण मान्यता प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
