24 आरोपी, 56 गवाह, 265 दस्तावेज…फिर भी पुलिस के हाथ खाली! संजू हत्याकांड के 350 पन्नों के फैसले ने खोली जांच की परतें

बिलासपुर की सड़कों पर दिनदहाड़े हुई एक हाईप्रोफाइल हत्या… पुलिस ने पारिवारिक संपत्ति विवाद से लेकर सुपारी किलिंग तक की पूरी कहानी तैयार की। 24 लोगों को आरोपी बनाया, 56 गवाह जुटाए और 265 दस्तावेजों के साथ अदालत पहुंची। लेकिन जब न्यायालय में इस कहानी को सबूतों की कसौटी पर परखा गया, तो एक-एक कर उसकी अहम कड़ियां कमजोर पड़ती चली गईं। करीब 350 पन्नों के फैसले ने पुलिस विवेचना की ऐसी कमियां उजागर की हैं, जो अब सिर्फ संजू हत्याकांड नहीं, बल्कि बिलासपुर पुलिस की जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
CG NEWS 24/EXCLUSIVE STORY/
Sanju Tripathi Murder Case: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दिनदहाड़े हुए संजू त्रिपाठी हत्याकांड का अंजाम अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जिसने पुलिस की पूरी जांच प्रक्रिया को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। जिस हत्याकांड में पुलिस ने पारिवारिक रंजिश, करोड़ों की संपत्ति के विवाद और उत्तर प्रदेश से बुलाए गए कथित शूटरों की साजिश का दावा किया था, उसी मामले में अदालत के सामने अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपना मामला साबित नहीं कर सका।
24 लोगों को आरोपी बनाया गया। 22 गिरफ्तार हुए। 56 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए। 265 दस्तावेज अदालत में पेश किए गए। लेकिन करीब 350 पन्नों के फैसले के बाद नतीजा यह रहा कि गिरफ्तार किए गए सभी 22 आरोपी दोषमुक्त हो गए। शुक्रवार, 30 अक्टूबर को अतिरिक्त दशम सत्र न्यायाधीश आदित्य जोशी की अदालत से आए इस फैसले ने अब एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या पुलिस ने हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने से ज्यादा आरोपियों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया, या फिर अदालत में पहुंचने तक जांच के अहम सबूत ही कमजोर पड़ गए?
14 दिसंबर 2022 को सकरी बाइपास पर संजू त्रिपाठी की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस वारदात ने पूरे बिलासपुर में सनसनी फैला दी थी। पुलिस ने जांच में छोटे भाई कपिल त्रिपाठी को मुख्य साजिशकर्ता बताते हुए दावा किया था कि संपत्ति विवाद के चलते उत्तर प्रदेश के शूटरों को सुपारी देकर हत्या कराई गई। परिवार के सदस्यों से लेकर कथित शूटरों और मददगारों तक को इस मामले में आरोपी बनाया गया।
लेकिन अदालत में जब पुलिस को अपनी कहानी साबित करनी थी, तब जांच की कई कड़ियां एक-दूसरे से जुड़ती नजर नहीं आईं। पोस्टमार्टम के रिकॉर्ड से लेकर गोलियों की संख्या, चश्मदीदों की गवाही और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों तक में ऐसी कमियां सामने आईं, जिन्होंने अभियोजन के पूरे मामले को कमजोर कर दिया।
350 पन्नों के फैसले में जांच की 7 बड़ी कमजोरियां
1. मौत के समय का रिकॉर्ड ही सवालों में
पुलिस ने संजू की मौत का समय शाम 4:15 बजे दर्ज किया था। लेकिन रिकॉर्ड में मौत के करीब 15 घंटे बाद अपोलो अस्पताल में ईसीजी और एक्सरे किए जाने का उल्लेख सामने आया। अदालत में पुलिस इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी कि इस बीच शव कहां रखा गया था और इन चिकित्सकीय प्रक्रियाओं का समय से क्या संबंध था। जांच के इस पहलू ने मेडिकल रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए।
2. कार पर 13 गोलियां चलने का दावा, लेकिन निशान कहां?
पुलिस की कहानी में हमले के दौरान कार पर 13 गोलियां चलने का दावा किया गया था। लेकिन जांच में वाहन पर उतने गोलियों के निशान नहीं मिले। कार के अंदर से भी अपेक्षित गोलियां बरामद नहीं हुईं। ऐसे में फायरिंग की वास्तविक संख्या और घटना के दौरान इस्तेमाल किए गए हथियारों से जुड़े सवालों का जवाब अभियोजन पक्ष मजबूती से नहीं दे सका।
3. पोस्टमार्टम और चालान के आंकड़ों में अंतर
शव परीक्षण से जुड़े रिकॉर्ड में शरीर से तीन गोलियां निकलने का उल्लेख था, जबकि चालान में डॉक्टर की रिपोर्ट के आधार पर छह गोलियां मिलने की बात सामने आई। गोलियों की संख्या में इस अंतर को पुलिस स्पष्ट नहीं कर सकी। हत्या जैसे गंभीर मामले में मेडिकल साक्ष्य और पुलिस की विवेचना के बीच यह अंतर अभियोजन के लिए बड़ी कमजोरी बन गया।
4. 56 गवाह, लेकिन अहम निजी गवाह ही मुकर गए
पुलिस ने मामले को मजबूत बनाने के लिए 56 गवाहों को अदालत में पेश किया। इनमें प्रत्यक्षदर्शी और निजी गवाह भी शामिल थे। लेकिन पान ठेला संचालक समेत कुछ महत्वपूर्ण निजी गवाह अदालत में अपने पहले के बयानों से मुकर गए। यानी जिस गवाही के सहारे घटनाक्रम और आरोपियों की भूमिका को प्रमाणित करना था, वही अदालत में अभियोजन का साथ नहीं दे सकी।
5. संपत्ति विवाद को हत्या की वजह साबित नहीं कर सकी पुलिस
पुलिस ने शुरुआत से ही संजू और उनके छोटे भाई कपिल त्रिपाठी के बीच संपत्ति विवाद को हत्या की मुख्य वजह बताया था। इसी आधार पर हत्या की साजिश की थ्योरी तैयार की गई। लेकिन अदालत में सिर्फ विवाद होने की बात से हत्या की साजिश साबित नहीं हो सकी। पुलिस यह प्रमाणित नहीं कर पाई कि कथित विवाद के आधार पर हत्या की योजना बनाई गई और उसमें आरोपियों की क्या भूमिका थी।
6. मोबाइल लोकेशन और कॉल डिटेल के सबूतों में बड़ी चूक
हत्याकांड की जांच में मोबाइल लोकेशन और कॉल डिटेल को अहम इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल किया गया था। लेकिन इन रिकॉर्ड को निकलवाने वाले संबंधित नोडल अधिकारियों के बयान अदालत में पेश नहीं किए गए। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को प्रमाणित करने के लिए आवश्यक भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत नहीं किया गया। इससे डिजिटल साक्ष्यों को अदालत में साबित करने की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
7. 24 आरोपियों की सूची, लेकिन किसकी क्या भूमिका थी?
पुलिस ने हत्या की साजिश में परिवार के सदस्यों, कथित शूटरों और अन्य मददगारों को आरोपी बनाया था। लेकिन अभियोजन पक्ष प्रत्येक आरोपी की भूमिका और कथित साजिश में उसके योगदान को ठोस साक्ष्यों से जोड़ने में सफल नहीं हुआ। किसने योजना बनाई, किसने सुपारी दी, किसने मदद की और किसने गोली चलाई—इन कड़ियों को अदालत में संदेह से परे साबित नहीं किया जा सका।
पुलिस की कहानी और अदालत में साबित होने वाली कहानी के बीच फासला
इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू यही है कि पुलिस ने जांच के दौरान हत्या के पीछे एक संगठित साजिश की तस्वीर पेश की थी। इसमें संपत्ति विवाद को वजह, कपिल त्रिपाठी को कथित मुख्य साजिशकर्ता और उत्तर प्रदेश के शूटरों को वारदात को अंजाम देने वाला समूह बताया गया था।
लेकिन अदालत में किसी भी आरोपी की दोषसिद्धि के लिए केवल आरोप, आशंका या जांच में तैयार की गई थ्योरी पर्याप्त नहीं होती। अभियोजन को हर महत्वपूर्ण कड़ी को विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना होता है। संजू हत्याकांड में यही सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई।
इस फैसले के बाद सवाल सिर्फ 22 आरोपियों के बरी होने का नहीं है। सवाल यह भी है कि दिनदहाड़े हुई इतनी बड़ी वारदात की जांच में जुटे अधिकारियों ने मेडिकल रिकॉर्ड, प्रत्यक्षदर्शियों, डिजिटल साक्ष्यों और आरोपियों की भूमिका को जोड़ने में कहां चूक की?
अब हाईकोर्ट में अपील की तैयारी, जांच अधिकारियों पर भी कार्रवाई की मांग
फैसले के बाद SP रजनेश सिंह ने कहा कि अदालत के निर्णय का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा और नियमानुसार हाईकोर्ट में अपील की जाएगी। उन्होंने जांच में लापरवाही या गलती करने वाले पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात भी कही है।
अब इस मामले में दो मोर्चों पर आगे की लड़ाई दिखाई दे रही है। एक तरफ फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की तैयारी है, तो दूसरी तरफ पुलिस विवेचना में सामने आई कमियों के लिए जिम्मेदारी तय करने की मांग उठ रही है।
संजू त्रिपाठी की हत्या के करीब चार साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल कायम है—आखिर दिनदहाड़े हुई इस हत्या की साजिश किसने रची और उसे अंजाम किसने दिया? अदालत में आरोप साबित नहीं हो सके, लेकिन वारदात की सच्चाई जानने का सवाल अब भी बाकी है।
