नक्सलवाद के खात्मे पर त्वरित टिप्पणी: नक्सलवाद की राख में छिपे अश्वत्थामा से सतर्क रहने का वक्त
नक्सलवाद के खात्मे के दावे के बीच नई चिंता- क्या खतरा सच में खत्म हुआ? जानिए क्यों ‘अश्वत्थामा’ की तरह छिपे खतरे से सतर्क रहना जरूरी है और आगे की असली चुनौती क्या है।
डॉ. हिमांशु द्विवेदी (प्रधान संपादक- हरिभूमि और inh न्यूज़)
बीस हजार से अधिक निर्दोष नागरिकों और हजारों सुरक्षाकर्मियों को मौत के घाट उतार देने वाले सशस्त्र नक्सलवाद को लेकर मोदी सरकार में गृहमंत्री अमित शाह ने जब 24 अगस्त 2024 को छत्तीसगढ़ में दहाड़ते हुए कहा था कि, देश से हम 31 मार्च 2026 को इसे खत्म कर देंगे… तो लोग हैरत में पड़ गए थे। अमित शाह की राजनीतिक क्षमता और प्रशासनिक दक्षता के लोग कायल हैं लेकिन यह ऐलान तो बतौर ज्योतिषी महसूस हुआ था। वक्त गुजरने के साथ समझ में आने लगा कि, शाह ने यह दावा अंतरिक्ष में नक्षत्रों की स्थिति को देखकर नहीं बल्कि जमीं पर सुव्यवस्थित रणनीति बनाकर किया था।

यह उपलब्धि महज डेढ़ साल की मेहनत के आधार पर नहीं आई है। इसके पीछे वर्षों की मेहनत है। इस परिणाम की अभिलाषा पहले भी रही लेकिन उसके साथ दृढ़ इच्छाशक्ति, राज्य-केंद्र समन्वय, विभिन्न सुरक्षाबलों के मध्य समन्वय, आधुनिक तकनीक का अधिकाधिक उपयोग का अभाव वांछित परिणाम नहीं दे सका। सुरक्षाबल जब-जब हाथों में हथियार थाम घने जंगलों में छिपे दुर्दांत नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन शुरू करते तो उनकी ढाल बन तमाम मानव अधिकारों के स्वघोषित पैरोकार सड़कों पर आ जाते थे।
जो विचारधारा संसदीय लोकतंत्र के खात्मे की अभिलाषा के साथ उपजी थी, उसकी पैरोकारी करने के लिए कुछ जनप्रतिनिधि तो चिल्ला-चिल्ला कर अपने गले से खून तक निकाल लेते थे। वनांचल में नक्सली अपनी दहशत और हुकूमत बनाए रखने गोली- गोली चलाते रहते और शहरों में बैठे उनके हमदर्द बोली-बोली का राग अलाप कोई ठोस कार्रवाई करने में रोड़ा अटकाते रहते। लेकिन, इन परिस्थितियों में बदलाव तब आया जब 2024 में नक्सल उन्मूलन के वादे के साथ नरेंद्र मोदी सत्तारूढ़ हुए।

लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि, कांग्रेस के नेतृत्व में केंद्र में यूपीए सरकार और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की सरकार के रहते सरगुजा अंचल से नक्सलियों को समाप्त करने में सफलता मिली थी। लेकिन, तिरुपति से पशुपति तक रेड कारिडोर की स्थापना की कोशिश कर रहे लोगों के खिलाफ यह सफलता पर्याप्त नहीं थी। केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ रणनीति में बदलाव आया और अमित शाह के द्वारा गृह मंत्रालय की कमान संभालने के साथ ही यह संघर्ष निर्णायक दौर में पहुंच गया। सामाजिक और सामरिक दृष्टि से योजना बनाकर काम शुरू हुआ।
छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य की कमान वरिष्ठ आदिवासी नेता विष्णु देव साय के हवाले किया जाना भी इस कार्य-योजना का हिस्सा था। इस एक फैसले ने आदिवासियों में अपनी सरकार होने का विश्वास और नक्सलियों के प्रति अविश्वास पैदा किया। वह अपनी सरकार बंदूक की नली से लाने की बात कहते थे, यहां अपनी सरकार बैलेट से ही अस्तित्व में आते देखा गया। बंदूक की जगह संविधान पर आस्था पैदा करने के लिए जहां नक्सलियों को सुखद भविष्य का संदेश देती आकर्षक पुनर्वास नीति लाई गई, वहीं दशकों से विकास की बाट जोह रहे आदिवासी इलाकों के लिए ‘नियद नेल्लानार’ जैसा कार्यक्रम भी शुरू किया।

सुरक्षाबलों ने सटीक रणनीति और परस्पर समन्वय के साथ आक्रामक आपरेशन किए। उनके पराक्रम ने नक्सलियों के हाड़ कंपा दिए। छत्तीसगढ़ में इन कोशिशों के बीच गृह विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा का उल्लेख ना किया जाना ज्यादती होगी। घोर नक्सली इलाकों में अपनी जान हथेली पर रखकर वह जवानों का हौसला बढ़ाते रहे, वहीं नक्सलियों से संवाद के माध्यम से उन्हें समर्पण के लिए प्रेरित भी करते रहे। इन कोशिशों में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के उदार सहयोग और समर्थन ने संकल्प को सिद्धि में बदल दिया।
लेकिन, इस साझा प्रयास के परिणाम को सहेजना हमारी साझा जिम्मेदारी है। जिन अभावों से यह संघर्ष अस्तित्व में आया था, उन्हें खत्म करना ही होगा। स्कूल, हास्पिटल, सड़क, थानों के साथ इन इलाकों में युवाओं के लिए स्थाई रोजगार के अवसर पैदा करने की जरूरत है। भूखे पेट और खाली हाथ कभी भी हथियार थाम सकते हैं, इस हकीकत को सरकार और समाज दोनों को ही बखूबी समझ लेना चाहिए।










