सांसदों से लेकर मंत्रियों तक… छत्तीसगढ़ में क्यों भिड़ते हैं नेता और अफसर? अब IAS की शिकायत ने फिर गरमाई सियासत
कभी कलेक्टर हटाने की मांग, कभी धरना-हाउस अरेस्ट… अब 3 IAS की लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत; आखिर किसके बीच टूट रहा है संवाद?

रायपुर, 11 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ की सियासत में नेताओं और अफसरों के बीच टकराव की कहानी पुरानी है, लेकिन हर बार सवाल वही उठता है—क्या प्रशासन जनप्रतिनिधियों की नहीं सुन रहा या फिर नेता अफसरों पर जरूरत से ज्यादा दबाव बना रहे हैं? जनता के काम, प्रोटोकॉल और प्रशासनिक फैसलों से शुरू होने वाला विवाद कई बार इतना बढ़ जाता है कि बात तबादले, जांच, धरने और एफआईआर तक पहुंच जाती है।
अब नया मामला सांसद बृजमोहन अग्रवाल और विजय बघेल से जुड़ा है। दोनों सांसदों ने तीन आईएएस अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत की है। शिकायत के बाद एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में यह सवाल चर्चा में है कि जनप्रतिनिधि और नौकरशाही के बीच आखिर ऐसा क्या है कि बार-बार टकराव की स्थिति बन रही है?
3 IAS की शिकायत ने फिर गरमाई सियासत
सांसद बृजमोहन अग्रवाल और विजय बघेल ने तीन आईएएस अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत की है। सांसदों का आरोप है कि अधिकारियों के साथ समन्वय की कमी का असर जनहित से जुड़े कार्यों पर पड़ रहा है।
यह सिर्फ अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल नहीं है। राजनीतिक गलियारों में इसे जनप्रतिनिधियों और ब्यूरोक्रेसी के बीच बढ़ती दूरी के एक और उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। अब बड़ा सवाल यह है कि शिकायत के बाद कार्रवाई किस दिशा में जाती है और क्या इससे प्रशासनिक व्यवस्था में कोई बदलाव आता है?
जब बात कलेक्टर हटाने तक पहुंची
छत्तीसगढ़ की राजनीति में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल और तत्कालीन कोरबा कलेक्टर के बीच मतभेद भी लंबे समय तक चर्चा में रहे। विवाद इतना बढ़ा कि पूर्व मंत्री ने तत्कालीन मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कलेक्टर को हटाने की मांग तक कर दी थी। आरोप था कि प्रशासन जनप्रतिनिधियों के निर्देशों को नजरअंदाज कर रहा है। यानी सवाल सिर्फ एक अधिकारी का नहीं था, बल्कि यह बहस छिड़ गई थी कि जिले में आखिर चलेगा किसका—जनप्रतिनिधि का जनादेश या अफसर की प्रशासनिक प्रक्रिया?
ननकी राम कंवर बनाम प्रशासन: धरने से हाउस अरेस्ट तक
पूर्व गृहमंत्री ननकी राम कंवर और जिला प्रशासन के बीच विवाद ने तो अलग ही रूप ले लिया था। मतभेद इतने बढ़े कि वे धरने पर बैठने की तैयारी में थे। हालात बिगड़ने पर उन्हें हाउस अरेस्ट तक करना पड़ा। बाद में बातचीत के जरिए मामला शांत कराया गया। यह घटना बताती है कि जब राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक अधिकार आमने-सामने आते हैं तो विवाद सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहता।
बृहस्पत सिंह का विवाद भी रहा सुर्खियों में
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के दौरान विधायक बृहस्पत सिंह और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच विवाद भी राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चित रहा। जनप्रतिनिधि और अधिकारियों के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप ने कई बार सरकार के सामने भी असहज स्थिति पैदा की। यही वजह है कि अफसरों की कार्यशैली को लेकर नेताओं की सार्वजनिक नाराजगी अक्सर राजनीतिक मुद्दा बन जाती है।
सीतापुर में विधायक और नायब तहसीलदार आमने-सामने
सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो और नायब तहसीलदार के बीच विवाद ने भी खूब सुर्खियां बटोरी थीं। यह मामला भी बताता है कि जमीनी स्तर पर जनता की शिकायतों और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच तालमेल नहीं बैठने पर विवाद किस तरह राजनीतिक रंग ले सकता है।
मंच से कलेक्टर-SP को नसीहत… रमन सिंह भी जता चुके हैं नाराजगी
प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह भी सार्वजनिक मंच से नाराजगी जता चुके हैं। बेमेतरा में सामूहिक विवाह कार्यक्रम के दौरान प्रशासनिक अव्यवस्था पर उन्होंने मंच से ही कलेक्टर और एसपी को कार्यप्रणाली सुधारने की सख्त नसीहत दी थी। यह घटना भी राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र के बीच जवाबदेही को लेकर बहस का हिस्सा बनी।
आखिर क्यों बार-बार आमने-सामने आ रहे हैं नेता और अफसर?
दरअसल, टकराव की जड़ में कई बार अधिकार क्षेत्र, प्रोटोकॉल, प्रशासनिक निर्णय और जनप्रतिनिधियों की अपेक्षाएं होती हैं। नेता चाहते हैं कि जनता की समस्याओं का समाधान तेजी से हो और उनके निर्देशों को प्रशासन प्राथमिकता दे। दूसरी तरफ अफसर नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार फैसले लेने की बात करते हैं। यहीं से टकराव की शुरुआत होती है। लेकिन जब बंद कमरे की बातचीत की जगह बयानबाजी शुरू हो जाए और संवाद की जगह आरोप-प्रत्यारोप ले लें, तो मामला तेजी से राजनीतिक बन जाता है।
सवाल बड़ा है—सरकार चलाएगी राजनीति या ब्यूरोक्रेसी?
छत्तीसगढ़ में बार-बार सामने आ रहे ये मामले सिर्फ व्यक्तिगत विवाद नहीं हैं। इनके पीछे राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक तंत्र के बीच बदलते रिश्तों की तस्वीर भी दिखाई देती है। लोकतंत्र में अंतिम जवाबदेही जनता के प्रति है। नेता जनता से वोट लेकर आते हैं और अफसर सरकार की नीतियों को जमीन पर लागू करते हैं। दोनों एक-दूसरे के बिना व्यवस्था को प्रभावी ढंग से नहीं चला सकते। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि नेता बड़ा या अफसर?
असली सवाल यह है कि जनता के काम के बीच आखिर वह कौन-सी दीवार है, जो बार-बार दोनों को आमने-सामने खड़ा कर देती है? और सांसदों की ओर से तीन IAS अधिकारियों की लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत के बाद अब छत्तीसगढ़ की सियासत में इसी सवाल का जवाब तलाशा जा रहा है।
