CM साय के सुशासन में गांव की बेटी बनी आत्मनिर्भर, बबली ने फोटो कॉपी से मशरूम और महुआ कारोबार तक बनाई अपनी पहचान

रायपुर, 24 अगस्त 2026। गांव में कभी रोजगार के सीमित साधन थे, लेकिन अब मेहनत और सरकारी योजनाओं के सहारे बबली यादव ने अपनी आमदनी के कई रास्ते खोल लिए हैं। गौरेला विकासखंड के ग्राम पंचायत चुकतीपानी की रहने वाली बबली आज फोटो कॉपी सेंटर चलाने के साथ मशरूम उत्पादन और महुआ खरीदी का काम भी कर रही हैं।
उनकी कहानी बताती है कि सरकारी योजनाओं का सहयोग, महिला समूह की ताकत और खुद कुछ करने का जज्बा मिल जाए तो गांव की महिलाएं भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकती हैं।
समूह से लिया ऋण, घर में शुरू किया फोटो कॉपी सेंटर
बबली यादव जागृति महिला स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष हैं। समूह के माध्यम से ऋण लेकर उन्होंने कंप्यूटर खरीदा और घर से ही फोटो कॉपी व कंप्यूटर से जुड़े काम शुरू किए।
गांव में ही सुविधा मिलने से ग्रामीणों को छोटे-छोटे कामों के लिए दूर नहीं जाना पड़ता। वहीं बबली को भी नियमित आमदनी का जरिया मिल गया।
एक काम पर नहीं रुकीं, मशरूम और महुआ को बनाया कमाई का जरिया
बबली ने अपनी आय बढ़ाने के लिए सिर्फ फोटो कॉपी के काम तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने मशरूम उत्पादन शुरू किया और इससे अतिरिक्त आमदनी हासिल करने लगीं।
इसके साथ ही वे पीजी समूह के माध्यम से महुआ खरीदी का काम भी कर रही हैं। यानी अब उनके पास कमाई के एक नहीं, बल्कि कई साधन हैं।
तीन कामों से करीब ₹10 हजार मासिक आय
बबली के मुताबिक फोटो कॉपी और कंप्यूटर कार्य, मशरूम उत्पादन तथा महुआ खरीदी से उन्हें करीब 10 हजार रुपये प्रतिमाह की आय हो जाती है। इस अतिरिक्त आय से अब वे परिवार की जरूरतों को पहले से बेहतर तरीके से पूरा कर पा रही हैं।
आवास और महतारी वंदन योजना का भी मिला लाभ
बबली के परिवार को प्रधानमंत्री आवास योजना और महतारी वंदन योजना का लाभ भी मिला है। उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं से मिली मदद ने परिवार को आर्थिक सहारा देने के साथ आगे बढ़ने का आत्मविश्वास भी दिया।
बबली कहती हैं कि महिलाओं को सिर्फ सहायता की जरूरत नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने के अवसर भी चाहिए। समूह और सरकारी योजनाओं ने उन्हें यही अवसर दिया।
अब खुद आत्मनिर्भर, दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा
बबली यादव की कहानी ग्रामीण महिलाओं के लिए एक संदेश है—कमाई के लिए बड़े शहर जाना जरूरी नहीं, अवसर मिले तो गांव में रहकर भी कई रास्ते बनाए जा सकते हैं।
फोटो कॉपी सेंटर से शुरू हुआ सफर मशरूम उत्पादन और महुआ कारोबार तक पहुंच गया है। आज बबली अपने परिवार का सहारा बनने के साथ गांव की दूसरी महिलाओं को भी स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की राह दिखा रही हैं।
बबली की कहानी में एक बात साफ है—सहारा जब मेहनत से जुड़ता है, तो सरकारी योजना सिर्फ मदद नहीं रहती, वह आत्मनिर्भरता की सीढ़ी बन जाती है।
