राजनीति

झीरम पर फिर आमने-सामने बघेल-साय, 13 साल पुराने जख्म पर सियासत तेज; पूर्व CM के आरोपों पर मुख्यमंत्री का पलटवार- ‘सत्ता में थे तो क्या किया?’

NIA जांच पर भूपेश बघेल के सवालों से गरमाई सियासत, CM साय ने पूछा- पांच साल सरकार में रहे, तब क्यों नहीं बढ़ाई जांच?


रायपुर, 31 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ की राजनीति में झीरम घाटी का मुद्दा एक बार फिर सियासी विस्फोट बनकर सामने आया है। करीब 13 साल पुराने इस खूनी अध्याय को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के एनआईए जांच पर उठाए सवालों के बाद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पलटवार किया है। साय ने सीधे बघेल के मुख्यमंत्री कार्यकाल पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि जब वे करीब पांच साल तक सत्ता में थे, तब उन्होंने मामले को आगे बढ़ाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए?

झीरम घाटी में कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं की हत्या का मामला पहले से ही राजनीतिक संवेदनशीलता के केंद्र में रहा है। अब एनआईए जांच को लेकर कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के आमने-सामने आने से एक बार फिर इस घटना की जांच, सुरक्षा व्यवस्था और इसके पीछे की साजिश जैसे सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं।

बघेल ने उठाए NIA की जांच पर सवाल, साय ने घेरा

बस्तर में कांग्रेस के प्रशिक्षण शिविर के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने झीरम घाटी मामले की एनआईए जांच पर सवाल उठाए थे। उन्होंने दावा किया कि एफआईआर में नाम दर्ज लोगों से जिस तरह पूछताछ होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई। घटना के समय मौके पर मौजूद लोगों के बयान भी पर्याप्त रूप से दर्ज नहीं किए जाने का आरोप उन्होंने लगाया।

बघेल ने जांच को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि झीरम हमले के पीछे जिन लोगों की भूमिका थी, जांच वहां तक नहीं पहुंच सकी। उन्होंने भाजपा सरकार पर मामले को दबाने का आरोप भी लगाया। यही बयान अब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के निशाने पर है।

CM साय का सीधा सवाल- सत्ता में थे तो कार्रवाई क्यों नहीं की?

मुख्यमंत्री साय ने बघेल के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि भूपेश बघेल लंबे समय तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उनके पास सरकार चलाने की पूरी ताकत और जांच को आगे बढ़ाने के तमाम अधिकार थे।

सीएम का सवाल साफ था—अगर झीरम मामले की जांच को लेकर इतनी गंभीरता थी, तो मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए?

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साय ने कहा कि केवल सत्ता से बाहर आने के बाद बयान देने से सवाल हल नहीं होंगे। झीरम जैसे गंभीर मामले में सच्चाई सामने लाने के लिए ठोस कार्रवाई और तथ्यों के आधार पर जांच जरूरी है।

झीरम पर राजनीति क्यों नहीं थम रही?

झीरम घाटी छत्तीसगढ़ की राजनीति का ऐसा अध्याय है, जिस पर समय बीतने के साथ भी बहस खत्म नहीं हुई। 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान दरभा की झीरम घाटी में नक्सलियों ने घात लगाकर बड़े काफिले पर हमला किया था।

इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल, बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा और उदय मुदलियार समेत कांग्रेस के कई नेताओं की मौत हुई थी। सुरक्षा जवान और अन्य लोग भी इस हमले में मारे गए थे।

घटना के बाद से ही यह सवाल उठता रहा है कि आखिर इतना बड़ा हमला किस तरह हुआ, सुरक्षा व्यवस्था में कहां चूक हुई और क्या हमले के पीछे केवल नक्सली साजिश थी या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक साजिश भी थी?

सुरक्षा व्यवस्था पर भी फिर उठे सवाल

झीरम विवाद के बीच सुरक्षा व्यवस्था का मुद्दा भी एक बार फिर चर्चा में है। मुख्यमंत्री साय ने जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा को लेकर कहा कि सुरक्षा की समीक्षा के लिए कमेटी गठित है। किसी व्यक्ति को कितनी सुरक्षा दी जानी है, इसका आकलन कमेटी करती है और उसकी सिफारिश के आधार पर सुरक्षा उपलब्ध कराई जाती है।

यानी सरकार का रुख साफ है कि सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय को राजनीतिक बयानबाजी के बजाय तय प्रक्रिया और खतरे के आकलन के आधार पर देखा जाएगा।

13 साल बाद भी झीरम के सवाल जिंदा

झीरम घाटी हमले को 13 साल से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन घटना से जुड़े कई सवाल आज भी राजनीतिक विमर्श में लौटते रहे हैं। हर बार जब जांच, रिपोर्ट या अदालत की प्रक्रिया से जुड़ा कोई नया घटनाक्रम सामने आता है, कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं।

इस बार भी मामला कुछ ऐसा ही है। एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री बघेल एनआईए जांच की दिशा और गंभीरता पर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री साय उनके ही शासनकाल को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। यानी झीरम का सवाल अब सिर्फ जांच का नहीं, सियासी जवाबदेही का भी बन गया है।

निवेश और माइनिंग पर भी CM का फोकस

झीरम विवाद के बीच मुख्यमंत्री साय ने छत्तीसगढ़ में निवेश और माइनिंग सेक्टर को लेकर सरकार की प्राथमिकताएं भी बताईं। उन्होंने कहा कि राज्य प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है और निवेशक यहां उत्पादन शुरू करने में रुचि दिखा रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि कमर्शियल माइनिंग के क्षेत्र में निवेश बढ़ने से राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। साथ ही आदिवासी, ग्रामीण और स्थानीय आबादी के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

सरकार का दावा है कि औद्योगिक और खनन गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर दिया जाएगा। निवेशकों से पौधरोपण और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करने की अपेक्षा की जा रही है।

अब नजर आगे की राजनीति पर

झीरम घाटी मामले में जांच और न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं। खासकर ऐसे समय में जब बस्तर और नक्सल मुद्दा राज्य की राजनीति में बेहद अहम बना हुआ है।

13 साल पुराने झीरम के जख्म पर अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि सच क्या है—सवाल यह भी है कि उस सच तक पहुंचने की जिम्मेदारी किसकी थी और किसने क्या किया?

cgnews24 Team

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