छत्तीसगढ़ में RSS का बड़ा बदलाव! दो प्रांत, दो प्रचारक…मोहन भागवत के दौरे से बढ़ी हलचल

बिलासपुर/रायपुर। छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संगठनात्मक ढांचे में बड़े बदलाव की तैयारी की चर्चा तेज हो गई है। प्रदेश में संघ की मौजूदा प्रांतीय इकाई को दो हिस्सों में बांटने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत दो अलग-अलग संगठनात्मक इकाइयां बनाकर उनके लिए अलग-अलग प्रांत प्रचारकों की व्यवस्था की जा सकती है। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के बिलासपुर प्रवास के बीच इस संभावित बदलाव ने संगठनात्मक और राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है।
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, बिलासपुर और सरगुजा संभाग को मिलाकर एक इकाई बनाई जा सकती है, जबकि रायपुर, दुर्ग और बस्तर संभाग को दूसरी इकाई में शामिल करने पर विचार है। हालांकि, इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय और आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।
दो प्रांतों में बंटेगा संघ का संगठन?
छत्तीसगढ़ में संघ की गतिविधियां अब तक एक ही प्रांतीय इकाई के अंतर्गत संचालित होती रही हैं। प्रदेश का भौगोलिक विस्तार, क्षेत्रीय परिस्थितियां और दूरस्थ इलाकों तक संगठन की पहुंच बढ़ाने की जरूरत इस प्रस्ताव के पीछे अहम वजहें मानी जा रही हैं। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो संगठन की जिम्मेदारियों का क्षेत्रवार बंटवारा होगा। दोनों इकाइयों में शाखाओं के विस्तार, कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण और संगठनात्मक गतिविधियों की निगरानी के लिए अलग-अलग नेतृत्व की व्यवस्था की जा सकती है।
मोहन भागवत के प्रवास पर नजर
संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का 22 और 23 अक्टूबर का बिलासपुर प्रवास इस चर्चा के बीच महत्वपूर्ण है। उनके कार्यक्रम में संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ बैठकें, गतिविधियों की समीक्षा और भविष्य की कार्ययोजना पर विचार-विमर्श शामिल है। इन बैठकों में संगठन के विस्तार, युवाओं की भागीदारी और क्षेत्रीय स्तर पर कामकाज को अधिक प्रभावी बनाने जैसे विषयों पर चर्चा हो सकती है। हालांकि, पुनर्गठन के प्रस्ताव पर अंतिम फैसला होने की पुष्टि अभी नहीं हुई है।
भाजपा की राजनीति में भी क्यों महत्वपूर्ण है यह चर्चा?
छत्तीसगढ़ में RSS और भाजपा के बीच वैचारिक एवं संगठनात्मक संबंधों को देखते हुए संघ के ढांचे में संभावित बदलाव पर राजनीतिक नजरें भी टिकी हैं। संगठन का विस्तार, सामाजिक संपर्क और कार्यकर्ताओं की सक्रियता व्यापक राजनीतिक संदर्भ में महत्वपूर्ण विषय हैं।
हालांकि, प्रस्तावित पुनर्गठन को सीधे भाजपा की चुनावी रणनीति से जोड़ने के लिए ठोस प्रमाण उपलब्ध होना जरूरी है। फिलहाल इसे संघ की संभावित संगठनात्मक कवायद के रूप में देखा जाना चाहिए। अब नजर इस बात पर है कि छत्तीसगढ़ में संघ की प्रांतीय इकाई को दो हिस्सों में बांटने के प्रस्ताव पर क्या निर्णय होता है। यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो प्रदेश में संगठनात्मक जिम्मेदारियों का मौजूदा ढांचा बदल सकता है।
