अपोलो अस्पताल प्रकरण: फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट, अस्पताल प्रबंधन पर क्लोजर रिपोर्ट


बिलासपुर के चर्चित अपोलो अस्पताल प्रकरण में पुलिस की लंबी जांच एक अहम मोड़ पर पहुंच गई है। थाना सरकण्डा में दर्ज अपराध क्रमांक 563/2025 की विवेचना पूरी होने के बाद पुलिस ने कथित फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम के खिलाफ न्यायालय में चार्जशीट पेश कर दी है। वहीं अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति की भूमिका की अलग से जांच करने के बाद उनके खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र या जानबूझकर संलिप्तता के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर क्लोजर रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की गई है।

2006 के इलाज से शुरू हुआ मामला, 2025 में पहुंची शिकायत

पुलिस के अनुसार 9 अप्रैल 2025 को डॉ. प्रदीप शुक्ला ने सरकण्डा थाने में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में उनके पिता स्वर्गीय पं. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला का इलाज बिलासपुर के अपोलो अस्पताल में हुआ था। आरोप है कि उस समय अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव ने उनकी एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की थी, जिसके बाद मरीज की मौत हो गई। शिकायत में यह भी कहा गया कि संबंधित चिकित्सक विधिवत योग्य और पंजीकृत हृदय रोग विशेषज्ञ नहीं थे तथा अस्पताल ने पर्याप्त सत्यापन के बिना उन्हें नियुक्त किया था।

कई राज्यों और संस्थानों से जुटाए गए दस्तावेज

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने विस्तृत जांच की। इस दौरान मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी बिलासपुर, अपोलो अस्पताल, पुलिस अधीक्षक दमोह (मध्यप्रदेश), छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल, उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज सहित कई संस्थानों से दस्तावेज और जानकारी जुटाई गई।

जांच में सामने आईं कई अहम बातें

पुलिस जांच में सामने आया कि वर्ष 2006 में डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव अपोलो अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत थे। अस्पताल प्रबंधन ने उनका बायोडाटा और नियुक्ति आदेश उपलब्ध कराया, लेकिन शैक्षणिक डिग्री और मेडिकल काउंसिल पंजीयन से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा सका।

विवेचना में यह भी सामने आया कि आरोपी ने खुद को एमबीबीएस, एमआरसीपी और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में फेलोशिप धारक बताया था। वहीं मेडिकल काउंसिल से मिली जानकारी के अनुसार “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से वैध पंजीयन प्रमाणित नहीं हुआ। दमोह में दर्ज मामले की जांच में यह भी पता चला कि आरोपी ने इसी नाम से आधार कार्ड, पैन कार्ड और अन्य दस्तावेज तैयार कराए थे। उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज से भी उसके नाम पर एमबीबीएस की वैध डिग्री का रिकॉर्ड नहीं मिला।

दमोह से गिरफ्तारी, बिलासपुर लाकर हुई पूछताछ

मध्यप्रदेश के दमोह में दर्ज मामले के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार किया गया। बाद में प्रोडक्शन वारंट पर उसे बिलासपुर लाया गया और पुलिस रिमांड में पूछताछ की गई।

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पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि वह अपोलो अस्पताल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत था और उसने कई मरीजों की एंजियोग्राफी एवं एंजियोप्लास्टी की थी। हालांकि बार-बार अवसर दिए जाने के बाद भी वह अपनी एमबीबीएस डिग्री के अलावा “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से कोई वैध मेडिकल योग्यता संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। पुलिस के अनुसार उसने अस्पताल में नियुक्ति “नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव” नाम से ली थी।

27 मरीजों की मौत का भी आया जिक्र

विवेचना के दौरान पुलिस के सामने यह जानकारी भी आई कि आरोपी के कार्यकाल में उपचार कराने वाले लगभग 27 मरीजों की मौत हुई थी। हालांकि पुलिस ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में पर्याप्त दस्तावेज और शिकायतकर्ता उपलब्ध नहीं मिले। जांच में केवल दो लोगों ने विधिवत शिकायत दर्ज कराई।

डॉक्टर के खिलाफ चार्जशीट, अस्पताल प्रबंधन पर अलग जांच

पुलिस ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी चिकित्सक के खिलाफ 27 जून 2025 को न्यायालय में अभियोग पत्र क्रमांक 671/2025 पेश किया। आरोपी के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार करने, कूटरचना, धोखाधड़ी और अवैध रूप से चिकित्सकीय कार्य करने के पर्याप्त साक्ष्य मिलने की बात कही गई है।

चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी पुलिस ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) के तहत अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति की भूमिका की अलग से जांच जारी रखी। इस दौरान अपोलो अस्पताल से दोबारा पत्राचार किया गया, डॉ. बी.आर. प्रेम कुमार से जानकारी ली गई और नियुक्ति से जुड़े उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण किया गया।

पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की जानकारी दी अस्पताल ने

अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस को लिखित जवाब में बताया कि संबंधित नियुक्ति लगभग 17-18 वर्ष पुरानी है। उस समय सभी रिकॉर्ड हार्ड कॉपी में रखे जाते थे और रिकॉर्ड संरक्षण की प्रक्रिया के तहत पुराने दस्तावेज नष्ट हो चुके हैं या अब उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए अतिरिक्त दस्तावेज उपलब्ध कराना संभव नहीं है।

विधिक राय के बाद क्लोजर रिपोर्ट पेश

पूरी केस डायरी का परीक्षण कराने के बाद पुलिस ने वरिष्ठ अधिकारियों और जिला अभियोजन अधिकारी से विधिक राय ली। राय में कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह साबित नहीं होता कि अस्पताल प्रबंधन या चयन समिति ने जानबूझकर या आपराधिक षड्यंत्र के तहत आरोपी की नियुक्ति की थी।

इसी आधार पर पुलिस ने अपोलो अस्पताल प्रबंधन और डॉ. बी.आर. प्रेम कुमार के संबंध में न्यायालय में क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। वहीं डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम के खिलाफ फर्जी दस्तावेज, कूटरचना, धोखाधड़ी और अवैध रूप से चिकित्सकीय कार्य करने के आरोपों में न्यायालय में आपराधिक कार्रवाई आगे जारी रहेगी।

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