50 साल पुरानी रजिस्ट्री पर आज सीमांकन! प्रशासन की कार्रवाई से करबला उजड़ने की आशंका….भू-माफिया–जमीन दलाल की मौजूदगी में प्रशासन पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप

बिलासपुर, 12 जनवरी 2025। बिलासपुर के करबला कोदू होटल चौक क्षेत्र में भूमि सीमांकन को लेकर विवाद अब सिर्फ राजस्व मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक संरक्षण, भू-माफिया और प्रशासन की मिलीभगत के गंभीर आरोपों तक पहुंच गया है।
विवाद अब प्रशासनिक लापरवाही और संभावित शहरी तबाही के सवाल तक पहुंच गया है। दरअसल, जूना बिलासपुर पटवारी हल्का के करबला में कोदू होटल चौक के पास करोड़ों रुपए की बेस-कीमती जमीन है। यहां नीलम कश्यप सहित अन्य की करीब एक एकड़ जमीन है। वहीं पास शिवप्रताप साव की भी पुरानी जमीन है। अब अचानक शिव प्रताप साव परिवार के वारिसों की तरफ से जमीन का सीमांकन कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया है। जिसके बाद विवाद की स्थिति बनने लगी है ।
जिन जमीनों पर सीमांकन के लिए राजस्व विभाग की टीम पहुंची है, उनमें से कई की रजिस्ट्री 40–50 साल पहले हो चुकी है। कई लोग सालों से घर- दुकान बनाकर l रह रहे हैं, ऐसे में स्थानीय लोगों का सवाल है—क्या प्रशासन इतने वर्षों तक सोता रहा? और अब अचानक सीमांकन के नाम पर पूरे इलाके को अस्थिर करने की तैयारी क्यों?प्रभावित भूमि मालिकों का आरोप है कि सीमांकन की पूरी प्रक्रिया एकतरफा, नियमविहीन और पूर्वनियोजित तरीके से की जा रही है, जिसमें भाजपा से जुड़े कुछ स्थानीय नेताओं, जमीन दलालों और राजस्व अमले की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है।
50 साल तक चुप्पी, अब अचानक कार्रवाई
प्रभावित नागरिकों का कहना है कि जिन भू-खंडों पर आज आपत्ति उठाई जा रही है, वहां दशकों से पक्के मकान, सड़कें, बिजली-पानी के कनेक्शन और नगर निगम के रिकॉर्ड मौजूद हैं। यदि जमीन अवैध थी या सीमांकन में गड़बड़ी थी, तो पिछले पांच दशकों में प्रशासन ने कभी कार्रवाई क्यों नहीं की?
प्रशासनिक गणना गलत तो पूरा करबला उलट जाएगा
स्थानीय लोगों का दावा है कि प्रशासन जिस पैमाने और नक्शे के आधार पर सीमांकन कर रहा है, वह यदि लागू किया गया तो करबला क्षेत्र की एक नहीं, बल्कि दर्जनों जमीनें एक-दूसरे में ‘चढ़ी हुई’ दिखेंगी। इस स्थिति में प्रशासन के ही तर्क के अनुसार, किसी की जमीन पर दूसरे का मकान बना हुआ माना जाएगा, वर्षों से बसे परिवार अवैध कब्जेदार घोषित हो सकते हैं, पूरा करबला इलाका कानूनी और सामाजिक अराजकता में फंस सकता है । स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि इस तरह का सीमांकन पूरे क्षेत्र को उजाड़ने जैसा साबित हो सकता है।
जमीन दलालों को फायदा, आम नागरिक को नुकसान
लोगों का आरोप है कि इस तरह की अव्यवहारिक और एकतरफा सीमांकन प्रक्रिया से जमीन दलालों और भू-माफिया को सीधा फायदा पहुंचेगा। दशकों पुराने वैध मालिकों को डराकर, भ्रम पैदा कर जमीनों को औने-पौने दामों में हड़पने की सुनियोजित साजिश का संदेह जताया जा रहा है।
भाजपा नेताओं की मौजूदगी पर सवाल
विवाद को और गंभीर बनाते हुए प्रभावित लोगों का कहना है कि मौके पर भाजपा से जुड़े कुछ स्थानीय नेताओं की मौजूदगी ने प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि राजनीतिक दबाव में राजस्व अमला एक पक्ष को फायदा पहुंचाने में जुटा है, जबकि वास्तविक दस्तावेज और पुराने सीमांकन रिकॉर्ड को नजरअंदाज किया जा रहा है।
प्रशासन की भूमिका संदिग्ध
प्रभावितों का कहना है कि यदि प्रशासन की मंशा साफ होती, तो पहले पुराने राजस्व रिकॉर्ड, नक्शे और रजिस्ट्री का सार्वजनिक सत्यापन किया जाता, सभी पक्षों को लिखित नोटिस और आपत्ति का अवसर दिया जाता, अचानक बलपूर्वक सीमांकन की बजाय सर्वे और पुनःमापन कराया जाता, लेकिन इन प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर सीधे जमीन पर कार्रवाई करना प्रशासन की नीयत पर सवाल खड़े करता है।
प्रशासन पर सीधा आरोप: भू-माफिया के लिए काम
भूमि मालिक चिमन रावलानी सहित अन्य प्रभावितों ने कहा कि यह पूरा मामला जमीन हड़पने की साजिश का हिस्सा है, जिसमें जमीन दलाल, राजनीतिक संरक्षण प्राप्त तत्व और प्रशासनिक अधिकारी एक साथ काम कर रहे हैं। उनका आरोप है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में जुना बिलासपुर के कई वैध जमीन मालिक अपनी ही जमीन पर कब्जा साबित करने को मजबूर हो जाएंगे।
करबला को ‘कागजी नक्शे’ से उजाड़ने की तैयारी?
स्थानीय नागरिकों ने तीखा सवाल उठाया है कि “यदि प्रशासन की वर्तमान गणना सही मानी जाए, तो करबला में शायद ही कोई ऐसा घर बचेगा जो किसी और की जमीन पर न बना हो। क्या प्रशासन पूरे इलाके को अवैध घोषित करने की तैयारी कर रहा है?”
नियमों की अनदेखी, जवाबदेही गायब
राजस्व नियमों के अनुसार सीमांकन से पहले सभी पक्षों को नोटिस, दस्तावेजों का परीक्षण और पारदर्शी प्रक्रिया अनिवार्य है, लेकिन इस मामले में इन सभी प्रावधानों की खुलेआम अनदेखी की गई। हैरानी की बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने अब तक कोई स्पष्ट जवाब या आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।
बिना सूचना, बिना सहमति सीमांकन
पीड़ित पक्षों के अनुसार राजस्व निरीक्षक परमेश्वर साहू और उनकी टीम ने सीमांकन की कार्रवाई शुरू की, लेकिन सभी वैध भूमि स्वामियों को न तो पूर्व सूचना दी गई और न ही मौके पर बुलाया गया। जिन लोगों की जमीन प्रभावित हो रही है, उन्हें जानबूझकर बाहर रखा गया, जबकि चयनित पक्षों की मौजूदगी में सीमांकन आगे बढ़ाया गया।
जमीन दलाल और कथित फर्जी वकील की भूमिका
स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि कार्रवाई के दौरान निलेंद्र सोनी नामक व्यक्ति सक्रिय रूप से मौजूद रहा, जो खुद को वकील बताता है। आरोप है कि वह न तो अधिकृत वकील है और न ही संबंधित भूमि का स्वामी, बल्कि भू-माफिया के लिए दलाली कर रहा है। सीमांकन की दिशा उसी के इशारों पर तय की गई, जिससे जमीन की वास्तविक स्थिति से छेड़छाड़ की आशंका गहराई है।
पीड़ितों ने स्पष्ट किया है कि यदि इस सीमांकन प्रक्रिया को तत्काल नहीं रोका गया और निष्पक्ष, वैज्ञानिक व पारदर्शी पुनःसीमांकन नहीं कराया गया, तो वे कलेक्टर कार्यालय का घेराव कमिश्नर व राज्य शासन से शिकायत और आवश्यकता पड़ी तो न्यायालय की शरण लेंगे।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक मनमानी बनाम नागरिक अधिकार का बन चुका है।









