बात_बेबाक; सिर्फ मीटर बदला, महकमे का मिजाज नहीं बदल रहा
हर्ष पांडेय, रायपुर, 1 अगस्त 2026. जरा सोचिए… आपके घर की छत टपक रही हो, दीवारों में दरारें हों, फर्श उधड़ी हुई हो और दरवाजा बंद ही न होता हो, लेकिन कोई आकर कहे कि सबसे पहले डिजिटल डोर लॉक लगा लीजिए। सुनने में जितना अजीब लगता है, छत्तीसगढ़ की बिजली व्यवस्था के साथ आज कुछ ऐसा ही हो रहा है।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस सिस्टम को पहले मजबूत किया जाना चाहिए था, उसी को छोड़ दिया गया और सबसे पहले उपभोक्ता के घर का मीटर बदलने का काम शुरू कर दिया गया। बिजली कंपनी स्मार्ट मीटर को बिजली क्षेत्र की बड़ी क्रांति बता रही है, लेकिन आम आदमी पूछ रहा है कि जब शहरों में आज तक अंडरग्राउंड केबलिंग नहीं हो सकी। खंभों पर मकड़जाल की तरह लटके तार हर बरसात में जानलेवा बने रहते हैं। ट्रांसफार्मर बिना सुरक्षा के खुले पड़े हैं। सड़क चौड़ी हो गई, लेकिन खंभे आज भी बीच सड़क में खड़े हैं। हल्की हवा या बारिश में घंटों बिजली गुल हो जाती है और फ्यूज कॉल जैसी सबसे बुनियादी सेवा भी दम तोड़ चुकी है… तब आखिर स्मार्ट क्या हुआ? व्यवस्था या सिर्फ मीटर?
तकनीक का विरोध कोई नहीं कर रहा। दुनिया के विकसित देशों में भी स्मार्ट मीटर लगे हैं और वहां उन्होंने बिजली वितरण को बेहतर बनाया है। लेकिन उन्होंने पहले वितरण व्यवस्था को दुरुस्त किया, फिर उपभोक्ता तक तकनीक पहुंचाई। हमारे यहां क्रम ठीक उल्टा है। पहले मीटर बदल दिए गए, लेकिन जर्जर तार नहीं बदले। करोड़ों रुपए का स्मार्ट मीटर प्रोजेक्ट लागू हो गई, लेकिन शहरों की बिजली लाइनें आज भी दशकों पुराने ढांचे पर टिकी हैं। आरडीएसएस के तहत छत्तीसगढ़ में स्मार्ट मीटरिंग पर लगभग 4100 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। बिजली कंपनी हर साल नेटवर्क विस्तार और रखरखाव पर भी हजारों करोड़ रुपए खर्च करने का दावा करती है। सवाल यह नहीं कि पैसा कितना खर्च हुआ, बल्कि यह है कि उसका असर उपभोक्ता को कहां दिख रहा है? अगर हजारों करोड़ खर्च होने के बाद भी पहली बारिश में मोहल्ले अंधेरे में डूब जाएं, बिजली के तार टूटकर सड़क पर गिर जाएं और शिकायत के बाद घंटों कर्मचारी न पहुंचे, तो जनता बजट नहीं, नतीजा देखेगी।
इसी बीच स्मार्ट मीटर लगने के बाद अधिक बिल आने की शिकायतों ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। बिजली कंपनी बेशक तकनीकी तर्क दे सकती है कि मीटर सही हैं, खपत सही दर्ज हो रही है, लेकिन भरोसा आंकड़ों से नहीं, अनुभव से बनता है। जब उपभोक्ता का बिजली बिल अचानक बढ़ जाता है, जब उसे अपनी खपत समझाने वाला कोई नहीं मिलता, जब शिकायत का समाधान समय पर नहीं होता, तब विवाद पैदा होना स्वाभाविक है। यह समझना जरूरी है कि स्मार्ट मीटर तभी सफल होंगे, जब स्मार्ट सेवा भी साथ दिखाई दे।
आज जरूरत किसी नई योजना का प्रचार करने की नहीं, बल्कि पुरानी अव्यवस्थाओं को खत्म करने की है। सबसे पहले अंडरग्राउंड केबलिंग का रोडमैप बने।
शहरों से खुले और जर्जर तार हटें। सड़क के बीच खड़े बिजली खंभों को शिफ्ट किया जाए। ट्रांसफार्मरों को सुरक्षित बनाया जाए। फ्यूज कॉल और शिकायत निवारण व्यवस्था को फिर से प्रभावी बनाया जाए। उपभोक्ता को बिजली कटौती और मरम्मत की रियल टाइम सूचना मिले। जब बिजली व्यवस्था भरोसेमंद होगी, तब स्मार्ट मीटर पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। लेकिन यदि व्यवस्था वही पुरानी रहे और सिर्फ मीटर नया हो जाए तो इसे सुधार नहीं, प्राथमिकताओं की सबसे बड़ी भूल ही कहा जाएगा। जनता मीटर से नहीं, बिजली व्यवस्था से परेशान है। इसलिए पहले व्यवस्था को स्मार्ट बनाएं, फिर मीटर बदलें।

