‘भोजली’ बनेगा छत्तीसगढ़ का पारंपरिक फ्रेंडशिप डे; भोजली अब सिर्फ त्योहार नहीं, छत्तीसगढ़ की पहचान बनेगी! महिलाओं ने संभाली कमान, गांव-गांव से उठेगी लोकसंस्कृति की आवाज
मितान-गिआ की परंपरा से रिश्तों की नई मिसाल, गांव-गांव पहुंच रहा भोजली का संदेश; अरपा किनारे स्थायी भोजली घाट की भी उठी मांग

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की मिट्टी से जुड़ी लोकपरंपराओं और तीज-त्योहारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए भोजली पर्व को बड़े स्तर पर पहचान दिलाने की तैयारी शुरू हो गई है। आयोजकों का कहना है कि भोजली महज एक पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, मित्रता, भाईचारे और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने वाली सदियों पुरानी छत्तीसगढ़ी परंपरा है। बदलते दौर में जब युवा पीढ़ी पारंपरिक त्योहारों से दूर हो रही है, ऐसे समय में भोजली को नई पीढ़ी से जोड़ने की मुहिम तेज की जा रही है।
जन कल्याण समिति बिलासपुर के संयोजक विष्णु यादव ने प्रेस क्लब में आयोजित ‘हमर पहुना’ कार्यक्रम में पत्रकारों से चर्चा करते हुए भोजली पर्व की परंपरा, आयोजन और इसे व्यापक पहचान दिलाने की योजना की जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में पश्चिमी संस्कृति से जुड़े कई दिवस तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की अपनी समृद्ध लोक परंपराओं को भी उसी उत्साह के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है। भोजली इसी सांस्कृतिक विरासत की पहचान है।
महिलाओं ने संभाली परंपरा बचाने की कमान
भोजली पर्व की सबसे खास तस्वीर महिलाओं और युवतियों की टोलियों में देखने को मिलती है। महिलाएं पारंपरिक तरीके से भोजली लेकर आयोजन में शामिल होती हैं और आपसी मेल-जोल तथा रिश्तों की परंपरा को आगे बढ़ाती हैं।
आयोजकों के मुताबिक भोजली में मितान, गिआ और महाप्रसाद बांटने की परंपरा सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक है। इसी वजह से आयोजक इसे छत्तीसगढ़ का पारंपरिक ‘फ्रेंडशिप डे’ भी बताते हैं।
उनका कहना है कि भोजली के माध्यम से नई पीढ़ी को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि दोस्ती और रिश्तों को मजबूत करने के लिए हमारी अपनी लोक परंपराओं में भी बेहद खूबसूरत व्यवस्थाएं मौजूद रही हैं।
अब भोजली सिर्फ गांव तक सीमित नहीं
आयोजकों ने बताया कि पिछले कई वर्षों से भोजली पर्व को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। इसके लिए गांवों की सूची तैयार कर प्रचार किया जाता है। अलग-अलग गांवों से महिलाओं की टोलियां भोजली लेकर आयोजन स्थल तक पहुंचती हैं। इससे धीरे-धीरे पर्व का स्वरूप बड़ा होता जा रहा है और इसमें महिलाओं के साथ युवाओं तथा समाज के अन्य वर्गों की भागीदारी भी बढ़ रही है।
आयोजकों के मुताबिक वर्ष 2023 में अरपा नदी किनारे बड़े स्तर पर आयोजन की शुरुआत के बाद भोजली पर्व को व्यापक मंच मिला। पहले आयोजन सीमित स्तर पर होते थे, लेकिन पर्याप्त जगह मिलने के बाद बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़ने लगे।
प्रतियोगिताओं के जरिए युवाओं को जोड़ने की कोशिश
भोजली को सिर्फ पारंपरिक आयोजन तक सीमित रखने के बजाय युवाओं और नई पीढ़ी की भागीदारी बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाता है। महिलाओं, युवतियों और युवाओं को इन आयोजनों में शामिल किया जाता है तथा बेहतर प्रदर्शन करने वालों को पुरस्कार देकर प्रोत्साहित किया जाता है। आयोजकों का मानना है कि परंपरा को बचाने का सबसे बेहतर तरीका उसे नई पीढ़ी के उत्सव का हिस्सा बनाना है।
अरपा किनारे स्थायी भोजली घाट की मांग
भोजली पर्व के साथ अब एक बड़ी मांग भी सामने आई है। आयोजकों ने अरपा नदी किनारे स्थायी और व्यवस्थित भोजली घाट बनाने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि पिछले कई वर्षों से स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों के सामने इस मांग को रखा जाता रहा है, लेकिन अब तक अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है। भोजली पर्व में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी होती है। ऐसे में नदी किनारे महिलाओं के लिए सुरक्षित, सुविधाजनक और व्यवस्थित घाट की आवश्यकता है। आयोजकों का कहना है कि यदि भोजली को बड़े स्तर पर पहचान दिलानी है तो आयोजन स्थल पर स्थायी बुनियादी सुविधाएं भी विकसित करनी होंगी।
‘संस्कृति बचाने की बात सिर्फ भाषणों तक सीमित न रहे’
आयोजकों ने कहा कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपराओं को बचाने की बात अक्सर होती है, लेकिन इसके लिए जमीन पर भी प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि भोजली केवल महिलाओं या किसी एक समुदाय का पर्व नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सामूहिक सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत है। इसे बचाने की जिम्मेदारी सरकार के साथ-साथ समाज के हर व्यक्ति की है।
अब लक्ष्य छत्तीसगढ़ से बाहर पहचान दिलाना
आयोजकों ने कहा कि अब प्रयास केवल बिलासपुर या छत्तीसगढ़ तक भोजली के आयोजन को सीमित रखने का नहीं है। उनकी कोशिश है कि भोजली को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाया जाए और छत्तीसगढ़ की इस अनूठी लोकपरंपरा को राष्ट्रीय पहचान मिले।
उनका कहना है कि जिस तरह देश-दुनिया में दूसरे राज्यों के पारंपरिक त्योहारों की पहचान बनी है, उसी तरह भोजली भी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का बड़ा ब्रांड बन सकता है। भोजली के बहाने एक तरफ जहां महिलाएं पुरखों से चली आ रही परंपरा को आगे बढ़ाने में जुटी हैं, वहीं आयोजकों का लक्ष्य इसे नई पीढ़ी से जोड़कर छत्तीसगढ़ की सीमाओं से बाहर तक पहुंचाना है। अब देखना होगा कि भोजली को स्थायी घाट और व्यापक मंच देने की मांग पर प्रशासन और जनप्रतिनिधि कितना गंभीर कदम उठाते हैं।
