….कभी हाथों में थी बंदूक, आज उसी हाथ में तिरंगा! सुकमा में 112 आत्मसमर्पित युवाओं ने लिखी बदलाव की नई कहानी
सुकमा का यह स्वतंत्रता दिवस समारोह एक बड़ा संदेश दे गया—जब हाथों से बंदूक छूटती है और तिरंगा थाम लिया जाता है, तो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, पूरी जिंदगी की दिशा बदल जाती है।

सुकमा। कभी हिंसा के रास्ते पर कदम बढ़ाने वाले 112 आत्मसमर्पित युवाओं ने इस स्वतंत्रता दिवस पर हाथों में तिरंगा थामकर शांति, भाईचारे और राष्ट्रप्रेम का संदेश दिया। सुकमा के पुनर्वास केंद्र में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में जब इन युवाओं ने तिरंगे को सलामी दी, तो यह दृश्य सिर्फ एक समारोह नहीं, बल्कि बदलाव और नई शुरुआत की तस्वीर बन गया।
बंदूक की जगह तिरंगा, हिंसा की जगह शांति
जिन हाथों में कभी हथियार हुआ करते थे, उन्हीं हाथों में आज देश की आन-बान-शान तिरंगा नजर आया। आत्मसमर्पण के बाद शासन की पुनर्वास नीति के जरिए इन युवाओं को समाज की मुख्यधारा में लौटने और सम्मान के साथ नई जिंदगी शुरू करने का अवसर मिल रहा है। यह बदलाव सुकमा में शांति और पुनर्वास की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की एक प्रेरक मिसाल के तौर पर सामने आया।
पुनर्वासित महिला के हाथों फहराया तिरंगा
स्वतंत्रता दिवस समारोह में पुलिस अधीक्षक मयंक गुर्जर पुनर्वास केंद्र पहुंचे। उन्होंने पुनर्वासित महिला अमीला पदामी को ध्वजारोहण के लिए आमंत्रित किया।
अमीला पदामी के हाथों तिरंगा फहराए जाने का क्षण बेहद भावुक और प्रेरणादायी रहा। राष्ट्रगान के दौरान सभी पुनर्वासित युवाओं ने तिरंगे को सलामी देकर देश के प्रति अपनी आस्था और सम्मान जाहिर किया।
एसपी मयंक गुर्जर की इस संवेदनशील पहल ने आत्मसमर्पित युवाओं के भीतर आत्मविश्वास, सम्मान और अपनत्व की भावना को और मजबूत किया।
हिंसा से मुख्यधारा तक… अब नई राह पर जिंदगी
आत्मसमर्पण के बाद इन युवाओं की जिंदगी में बदलाव की नई शुरुआत हुई है। शासन-प्रशासन की पुनर्वास नीति के जरिए उन्हें हिंसा छोड़कर शांति, रोजगार और सम्मान के साथ आगे बढ़ने का मौका मिल रहा है।
सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने के बाद ये युवा अब अपने परिवार और समाज के लिए बेहतर भविष्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
