प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, इस फैसले से SC/ST सरकारी कर्मचारियों पर पड़ेगा बड़ा


पदोन्नति में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने आज एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 12 साल पहले पदोन्नति में आरक्षण पर दिए फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि इसपर फिर से विचार करने की जरूरत और आंकड़ें जुटाने की आवश्यकता नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि 2006 में नागराज मामले में दिए गए उस फैसले को सात सदस्यों की पीठ के पास भेजने की जरूरत नहीं है, जिसमें अनुसूचित जातियों (एससी) एवं अनुसूचित जनजातियों (एसटी) को नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए शर्तें तय की गई थीं। 

उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार की यह अर्जी भी खारिज कर दी कि एससी/एसटी को आरक्षण दिए जाने में उनकी कुल आबादी पर विचार किया जाए। 

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि एससी/एसटी कर्मचारियों को नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए राज्य सरकारों को एससी/एसटी के पिछड़ेपन पर उनकी संख्या बताने वाला आंकड़ा इकट्ठा करने की कोई जरूरत नहीं है। 

प्रमोशन में आरक्षण की मांग का इतिहास :

1. एससी/एसटी को सबसे पहले 1955 में पदोन्नति में आरक्षण दिया गया था ।

2. 1992 में इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया था। जिसके बाद सरकार को सरकारी नौकरियों में मिलने वाले पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लगानी पड़ी ।

3. 1955 में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने संविधान में 77वां संशोधन कर अनुच्छेद 16 में नई धारा 4/A को जोड़ा गया जिसके तहत एससी-एसटी प्रतिभागियों को वरियता देते हुए पदोन्नत किया जा सकता था ।

4. इस नए कानून की संविधानिक वैधता को फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। 2006 में एम नागराज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में न्यायालय निर्देश दिए कि प्रमोशन देने के लिए संबंधित राज्य को अनुच्छेद 335 के तहत जायज कारण बताने होंगे मसलन पिछड़ापन,प्रतिनिधित्व की कमी और प्रतिभागी की प्रशासनिक योग्यता ।

5. 2010 में राजस्थान हाईकोर्ट और 2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय की इसी निर्देश का पालन करते हुए पदोन्नति में आरक्षण के राज्य सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया था।

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